भारतीय क्रिप्टो यूजर्स अब ओवरसीज प्लेटफॉर्म्स के जरिए गिफ्ट कार्ड्स से किराना, फ्यूल, रिचार्ज और सोना खरीद रहे हैं। Economic Times रिपोर्ट, कैसे काम करता है यह सिस्टम, टैक्स और रेगुलेटरी चिंताएं। Bitcoin in Bharat पर पूरी डिटेल।
भारत में क्रिप्टो से रोजमर्रा की खरीदारी: गिफ्ट कार्ड्स के जरिए किराना, ईंधन और सोना
हाल ही में Economic Times की एक रिपोर्ट ने क्रिप्टो दुनिया में एक दिलचस्प ट्रेंड को उजागर किया है। भारत में कई लोग अब क्रिप्टोकरेंसी (खासकर स्टेबलकॉइन्स जैसे USDT) का इस्तेमाल करके घरेलू सामान—किराना, ईंधन, मोबाइल रिचार्ज, फूड डिलीवरी और यहां तक कि सोना—खरीद रहे हैं। यह सब ओवरसीज गिफ्ट कार्ड प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से हो रहा है।
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
यह प्रक्रिया काफी सरल लेकिन स्मार्ट है:
भारतीय यूजर अपने प्राइवेट वॉलेट से स्टेबलकॉइन या अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) विदेशी प्लेटफॉर्म्स (स्वीडन, जर्मनी, सिंगापुर आदि में रजिस्टर्ड) को भेजते हैं।
ये प्लेटफॉर्म्स भारतीय वॉचर इश्यूअर और एग्रीगेटर्स से बल्क में गिफ्ट कार्ड्स/वाउचर्स खरीदते हैं।
यूजर को डिजिटल गिफ्ट कार्ड कोड मिल जाता है, जिसे वह भारत में किराना स्टोर, पेट्रोल पंप, ज्वेलरी शॉप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर इस्तेमाल कर सकता है।
ये गिफ्ट कार्ड्स क्लोज़्ड-लूप होते हैं—यानी नकदी निकालने या थर्ड-पार्टी पेमेंट के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकते। इसलिए ये RBI के प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट नियमों के दायरे से बाहर रहते हैं और कोई सख्त लिमिट भी नहीं लगती।
एक प्लेटफॉर्म ने अकेले भारतीय यूजर्स को 1.6 करोड़ से ज्यादा कार्ड्स जारी किए हैं। रूपांतरण रेट कभी-कभी भारत के लोकल रेट से कम होता है (जैसे 1 USDT = ₹88, जबकि भारत में यह ₹95 के आसपास हो सकता है), लेकिन यूजर्स इसे स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि ट्रांजेक्शन बैंकिंग सिस्टम और टैक्स सिस्टम से बाहर रहता है।
क्यों हो रहा है यह ट्रेंड?
बैंक और एक्सचेंज से बचने के लिए**: कई यूजर भारतीय एक्सचेंजों से विड्रॉ करने के बजाय प्राइवेट वॉलेट से सीधे विदेशी प्लेटफॉर्म को क्रिप्टो भेजते हैं। इससे ट्रेल कम बचता है।
रोजमर्रा के खर्च**: क्रिप्टो को सिर्फ इन्वेस्टमेंट नहीं, बल्कि खर्च करने का माध्यम बनाने की चाह।
अघोषित या सस्पिशियस क्रिप्टो**: कुछ मामलों में जो क्रिप्टो आयकर रिटर्न में नहीं दिखाई जाती, उसे इस तरीके से खर्च किया जा सकता है।
Digital South Trust के फाउंडर सुधाकर लक्ष्मणराजा ने बताया कि कई ओवरसीज प्लेटफॉर्म्स भारतीय यूजर्स के लिए ऐसे पेमेंट पाथवेज उपलब्ध करा रहे हैं, जिनमें लोकल इंटरमीडियरीज शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इस क्रॉस-बॉर्डर सिस्टम के स्केल को देखते हुए रेगुलेटरी ओवरसाइट की जरूरत है।
रेगुलेटरी और टैक्स चिंताएं
यह तरीका रेगुलेटर्स की नजर में आ चुका है। फाइनेंस और होम मिनिस्ट्री को इस मैकेनिज्म के बारे में जानकारी दी गई है। मुख्य मुद्दे हैं:
क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स**: भारत में विदेशी भुगतान के स्पष्ट नियम हैं। क्रिप्टो के जरिए उसी आर्थिक नतीजे को बैंकिंग सिस्टम के बाहर हासिल करना चिंता का विषय है।
AML (एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग) और टैक्स**: VDA पर AML और टैक्स नियम लागू होते हैं, लेकिन फॉरेक्स फ्रेमवर्क में क्रिप्टो ट्रांसफर और उसे वाउचर्स में बदलने को लेकर स्पष्टता की कमी है।
गिफ्ट कार्ड का दुरुपयोग**: कोड एक व्यक्ति से दूसरे को पास किया जा सकता है, जिससे ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जबकि टैक्स और AML नियम VDAs पर लागू हैं, विदेशी मुद्रा नियमों में और स्पष्टता की जरूरत है।
Bitcoin in Bharat के नजरिए से
यह ट्रेंड दिखाता है कि भारत में क्रिप्टो एडॉप्शन सिर्फ ट्रेडिंग तक सीमित नहीं रह गया है। लोग क्रिप्टो को रियल यूटिलिटी के रूप में इस्तेमाल करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। गिफ्ट कार्ड रूट एक “जुगाड़” है जो मौजूदा रेगुलेटरी गैप्स का फायदा उठाता है।
हालांकि, यूजर्स को सावधान रहना चाहिए:
टैक्स नियमों का पालन करें (30% टैक्स + 1% TDS जहां लागू हो)।
अनरेगुलेटेड प्लेटफॉर्म्स पर स्कैम और फंड लॉक का जोखिम रहता है।
रेगुलेटर्स किसी भी समय सख्ती बढ़ा सकते हैं।
भारत में क्रिप्टो रेगुलेशन अभी विकसित हो रहा है। ऐसे इनोवेटिव यूज केस दिखाते हैं कि मांग मजबूत है, लेकिन साथ ही रेगुलेटरी स्पष्टता की जरूरत भी बढ़ रही है।
स्रोत: Economic Times रिपोर्ट (सितंबर 2026) और संबंधित विशेषज्ञ टिप्पणियां।

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